बाबाओं और कथा वाचकों पर सवाल उठाकर कब तक जिम्मेदारियों से बचेगा प्रशासन और सरकार

                         एड0 आर0 के0 पाण्डेय                         

कब तक होते रहेंगे हाथरस कांड ?

★  निलंबन के बजाय बर्खास्तगी क्यों नहीं?

 प्रयागराज। "9 दिन चले अढ़ाई कोस" यह कहावत आजाद भारत में 1947 से अभी तक प्रायः सभी महत्वपूर्ण घटनाओं में देखी जा रही है। जब कोई गंभीर समस्या पैदा होती है तो कुछ दिन हो हल्ला करने के बाद सरकार, प्रशासनिक अधिकारी और राजनीतिक दल पूर्ववत खामोशी में चले जाते हैं और समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती है। ऐसा ही कुछ हाथरस भगदड़ कांड में देखने को मिल रहा है जिसमें वास्तविक जिम्मेदारों के बजाय लीपा पोती की कहानी की जा रही है।


   उपरोक्त के संदर्भ में मीडिया से बात करते हुए वरिष्ठ समाजसेवी अधिवक्ता आर के पाण्डेय ने कहा ने पूछा कि आखिर समय-समय पर बाबाओं और कथावाचकों पर सवाल उठा करके वास्तविक प्रशासनिक अधिकारी और सरकार कब तक बचेंगे? उन्हें पूछा क्या इस देश में हाथरस भगदड़ कांड प्रथम घटना है? आर के पाण्डेय ने कहा कि 100 - 50 की भीड़ के कार्यक्रम करने के लिए भी आम जनमानस को अनुमति लेने के लिए लंबे पापड़ बेलने पड़ते हैं लेकिन लाखों की भीड़ करने वाले इन बाबाओं, कथावाचकोंको व राजनीतिक दलों को बड़ी आसानी से अनुमति भी मिल जाती है और उनकी सेवा में प्रशासनिक अधिकारी और सरकार भागीदारी भी करती हैं। उन्होंने पूछा कि हाथरस कांड के लिए अगर आयोजकऔर मुख्य कथावाचक दोषी हैं तो आखिर आयोजन को अनुमति देने वाले अधिकारी क्यों नहीं? अनुमति पत्र में निर्धारित संख्या से बहुत ज्यादा भीड़ होने पर आखिर प्रशासन ने क्या किया?

उन्होंने सवाल उठाया कि जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों को निलंबित करने के कुछ समय बाद बहाल करते रहने की परंपरा कब तक चलेगी? जब यह साबित है कि प्रशासनिक अधिकारियों की घोर लापरवाही से ऐसी घटनाएं होती हैं तो उन्हें सीधे बर्खास्त क्यों नहीं किया जाता? मरने वालों के परिवारों को उचित मुआवजा देने के साथ प्रशासनिक अधिकारियों व सरकार के स्थानीय जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों पर एफआईआर दर्ज क्यों नहीं होती? आर के पाण्डेय ने कहा कि अब समय आ गया है जबकि हाथरस कांड जैसी दुर्घटनाओं से हमेशा के लिए मुक्ति के लिए सरकार को एक ठोस पहल करनी पड़ेगी और बिना किसी भेदभाव के कठोरतम कार्रवाही की व्यवस्था करनी पड़ेगी ताकि आगे से किसी भी आयोजक, किसी कथा वाचक, किसी प्रशासनिक अधिकारी व किसी सरकार के लिए इन बाबाओ व कथावाचकों का गणेश परिक्रमा न करना पड़े बल्कि व्यवस्था सुचारू से चलती रहे।

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